मन करता है पंछियों की तरह खुले आकाश में
उड़ती फिरु,
कोई कितना भी रोके किसी के रोके न रुकूँ ।
जो दिल मे आये करू वो मनमानी,
बचपन की तरह वो मीठी सी,प्यारी सी,
अल्हड़ सी शैतानी ।
कभी यहां कभी वहां,
उड़ती फिरू, उड़ती फिरू ,बस उड़ती फिरू।

©️ काव्या शेखर
मन करता है पंछियों की तरह खुले आकाश में
उड़ती फिरु,
कोई कितना भी रोके किसी के रोके न रुकूँ ।
जो दिल मे आये करू वो मनमानी,
बचपन की तरह वो मीठी सी,प्यारी सी,
अल्हड़ सी शैतानी ।
कभी यहां कभी वहां,
उड़ती फिरू, उड़ती फिरू ,बस उड़ती फिरू।

©️ काव्या शेखर




ओ रब्बा, तुने मेरी जिंदगी की किताब का
हर पन्ना काली स्याही से क्यों लिखा,
और अभी भी लिखता ही जा रहा ।
बहुत सब्र और हौसला है मुझमे,
मै इंतज़ार करूँगी की , कब तेरी वो काली
स्याही खत्म हो ,
और मेरी किताब के पन्नो पर एक नया रंग
हो ।
©️ काव्या शेखर

सब कुछ तो है मेरे पास फिर भी ये खालीपन सा क्यों है,
कुछ तो कमी है , हां शायद मेरे पास मैं ही नही हूँ ।
चेहरे पर हँसी भी है, मुस्कुराहट है पर कुछ कमी सी है,
हां, शायद वो दिल से आने वाली खिलखिलाहट नही है, शायद मेरे पास मैं ही नही हूँ ।
दोस्त है, हँसी- ठिठोलियाँ है, महफ़िलें भी है ,फिर भी एक अकेलापन है ,
शायद वो पहले जैसी सच्ची बेपरवाह यारियां नही है ।
शायद अब मेरे पास मैं ही नही हूँ ।
©️ काव्या शेखर

तेरे शहर का अज़ब दस्तूर है,
हर इंसान यहां कितना मजबूर है ।
एक मकान में तो रहते है,
दिलों से बहुत दूर है ।
बनावटी है चेहरे, रिश्ते कितने कमजोर है ।
प्यार का तो बस नाम का ही शोर है,
पल पल मरता है प्यार बस अहम ने थामी डोर है
©️ काव्या शेखर

जहाँ जहाँ से गुज़रे, हर एक से पुछा तुम्हें,
जब भी कुछ मांगा ख़ुदा से, बस मांगा तुम्हें ।
ये जानती हूँ की शायद, तुम मेरी किस्मत में नही, फिर भी इन हाथोँ की लकीरों में ढूंढा तुम्हें। अंजाम चाहें जो भी हो, मैंने तो इस दिल को बिछाया तेरी इन राहों में,
खवाइश है बस इतनी सी, बस ये ज़िन्दगी गुज़रे तेरी पनाहों में ।
तेरे प्यार की ख़ूशुबू बिखरी इन हवाओं में । हसरत हैं बस इतनी सी इस पागल दिल की,
की मौत भी आये तो तेरी बाहों में ।
©️ काव्या शेखर
