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अधूरा सा

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पग – चिन्हों

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इब्तिदा – ए – इश्क़

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एक बार फिर से

इज़हार-ए-मोहब्बत कर दो एक बार फिर से,

वो पुरानी शाम मेरे नाम कर दो एक बार फिर से ।

कुछ लम्हा ठहर जाओ बिना गीले और शिकवों के,

मैं तेरी ख़ूशुबू को कैद कर लूं ताउम्र के लिए एक बार फिर से ।

© काव्या शेखर

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दो वक़्त की रोटी

घर से निकले थे दो वक़्त की रोटी की तलाश में ,
वक़्त सही हो जाएगा बैठे थे इसी आस में,
रास्तों पे पड़े है भूखे प्यासे ,कुछ भी नहीं पास है,
अब तो उम्मीद भी नाउम्मीद ही चुकी है,
अब तो ना सांस बाकी रही , ना कोई चाह है।

© काव्या शेखर

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मजदूर

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हम मजदूर है

एक सफ़र है अधूरा सा,

जो न जानें कब होगा पूरा सा।

कभी चिलचिलाती धूप में ख़ुद को जलाता सा,

कभी छांव की तलाश में ख़ुद को मिटाता सा।

पांव में छाला है, खाने को ना निवाला है।

जेब मे ना पैसे है, ना किसी का सहारा है।

परिवार की फिक्र में,वक़्त नहीं बिताना है।

बस चल पड़े है सफ़र पे, आगे क्या होगा किसने जाना है।

किससे करे शिकायत, सुनेगा कौन फरियाद अपनी।

दर्द ना जाने कोई, सबको पड़ी है अपनी अपनी।

बस खाली वादे सुन कर, सब्र का बांध टूट गया अपना।

पैदल ही निकल पड़े है,अब नहीं किसी के लिए है रुकना।

जिसको देखो,जहां देखो, बस ज्ञान हमें ही बांटें।

दर्द हमारा वो क्या जाने, पास है जिनके खाने को और घर है बिताने को रातें।

किसको जान नहीं प्यारी, जब अपनों पे बन आएं तो कोरी सारी बातें है।

ये सूरज अपना निकलता नहीं , अब दिन भी अपने काले है।

भीख कभी ना मांगी हमने, मेहनत मजदूरी करके खाया।

घर बनाया दूसरों का, अपना एक घर ना बना पाया।

मजदूर हम कहलाते है पर अब मजबूर हो गए।

हालात ना सुधरे तो कहीं ऐसा ना हो, ज़िन्दगी से ही महरूम हो गए।

© काव्या शेखर

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किस्सा

“ज़िन्दगी का मेरी रोज का ये किस्सा है,
मेरे हर पल हर दिन का ये हिस्सा है

हर रोज तेरी तारीफ में कुछ नया लिखती हूं,
हर दिन शाम ढले खुद ही मिटा देती हूं

हर बार कुछ बदला सा होता है तुझमें
हर दफा तू लगे नया सा मुझे

अभी अधूरी है मेरी खोज
बाकी है अभी और करीब से पहचानना तुझे”

© काव्या शेखर

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मां

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Happy mothers day मां की सूरत

तू अखंड प्रेम की मूरत है

तुझसे प्यारी ना कोई सूरत है

तेरी ना कोई जाति है ,ना है कोई धर्म तेरा

तेरा ना कोई रूप है ना ही कोई रंग तेरा

ना कोई अलग है बोली तेरी,तू है मां बहुत ही भोली

तू जननी है तू पालनकर्ता,

तू है देवकी ,तू है यशोदा, तू है पन्ना धाय भी,

सहती कितना कुछ, है शक्ति की परिचायिका तू ,

जो लड़े दुखों से फिर भी हंसती रहे, जीवन की है नायिका तू ।

संसार ये बदला, रिश्ते बदले ,जीने के ढंग है बदले,

ऐ मां पर तेरी सूरत ना बदली ।

सदियां बीती, युग बीते , पर मंद पड़ा ना तेरे चेहरे का तेज,

युगों से आंखों में वहीं ममता का अथाह समंदर,

देवता भी नमन करते तुझको शीश झुकाकर ।

तेरा है उपकार मां मुझपर, जो कभी चुका ना पाऊंगी, पर तेरा जीवन खुशियों से भर दूं, तो धन्य मैं खुद को पाऊंगी ।

तू अखंड प्रेम की मूरत है

तुझसे प्यारी ना कोई सूरत है

हां मां तुझसे प्यारी ना कोई सूरत है ।

© काव्या शेखर

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