
इब्तिदा-ए-इश्क़

अल्फाजों का गहरा समंदर हो और डूबकर कही नहीं जाना है बस डूबते जाना है , डूबते जाना है ।


“कुछ नज़र आता नहीं, ज़िन्दगी में अंधेरे बहुत है ,ज़िन्दगी में मेरी, सूरज बनके आ जाना तुम ।
ना कोई बोलने वाला, ना कोई सुनने वाला, बस ख़ामोशी है,मेरी ज़िन्दगी में मेरी बकबक बनके आ जाना तुम ।
ना जाने क्यों, इन दिनों कड़वाहट सी बढ़ गई है, ज़िन्दगी में मेरी मिश्री बनकर घुल जाना तुम ।
अबकी जो आओ तो फिर लौट कर जाना ना कभी ,मेरी बाहों में ताउम्र के लिए ठहर जाना तुम”
©️ काव्या शेखर
” ज़िन्दगी में है ना जाने कितने रंग,
कभी हँसाती कभी कर जाती आंखें नम ।
कही खुशियाँ देती है बेशूमार,
कही ग़म के लिए जिंदगी भी पड़ जाती है कम ।
कही दिखती है ये कितनी रंग भारी,
और कही हो जाती है कितनी बेरंग ।”
©️ काव्या शेखर
तुम बिन लगे सब कितना खाली सा, अधूरा सा,
देखूं न तुझे तो ना दिन लगे पूरा सा ।
मेरी हर बात में, हर याद में, हर सांस पे है कब्ज़ा तेरा,
सब कुछ तो है तेरा, मुझमें कुछ ना मेरा ।
हर दुआ में सिर्फ तेरा साथ मांगा है,
चारों तरफ तेरी बस हो ख़ुशियों का घेरा।
तू खुश रहे हर पल हर लम्हा,
बेशक़ उस ख़ुशी में हिस्सा ना हो मेरा ।
©️ काव्या शेखर


कभी कभी मंजिल पर पहुंच कर भी,वो सुकून नहीं मिलता,
जो मंजिलों की तलाश में,रास्तों पे भटकने पे मिलता है ।
इश्क़ के मुकम्मल होने में वो बात कहां ,
जो इश्क़ को पाने की जद्दोजहद में मिलता है ।
©️ काव्या शेखर
तू दूर है नज़रों से लेकिन,
सर-ए-बज्म ज़िक्र कोई भी हो,
हर पल हर लम्हा सिर्फ तुम्हे देखते है ।
हम सिर्फ तुम्हे कहते है ।
©️ काव्या शेखर
कौन हुआ है उम्र भर किसी का,
ताउम्र कौन साथ देता है ,
ये तो बस कर्मा है आपका,
जो जिन्दगी भर साथ निभाता है ।
©️ काव्या शेखर
कहते है छुपाएं नही छुपते
ये इश्क़ के राज़,
जो लब न कह सके
आंखें कहती है वो बात ।
हमने तो आंखों से
बयां कर दिए हजारों अफ़साने,
वो समझ न पाए आंखों की जुबां ,
या जान कर भी बन बैठे अनजाने ।
©️ काव्या शेखर