घर से निकले थे दो वक़्त की रोटी की तलाश में ,
वक़्त सही हो जाएगा बैठे थे इसी आस में,
रास्तों पे पड़े है भूखे प्यासे ,कुछ भी नहीं पास है,
अब तो उम्मीद भी नाउम्मीद ही चुकी है,
अब तो ना सांस बाकी रही , ना कोई चाह है।
© काव्या शेखर

घर से निकले थे दो वक़्त की रोटी की तलाश में ,
वक़्त सही हो जाएगा बैठे थे इसी आस में,
रास्तों पे पड़े है भूखे प्यासे ,कुछ भी नहीं पास है,
अब तो उम्मीद भी नाउम्मीद ही चुकी है,
अब तो ना सांस बाकी रही , ना कोई चाह है।
© काव्या शेखर
