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हम मजदूर है

एक सफ़र है अधूरा सा,

जो न जानें कब होगा पूरा सा।

कभी चिलचिलाती धूप में ख़ुद को जलाता सा,

कभी छांव की तलाश में ख़ुद को मिटाता सा।

पांव में छाला है, खाने को ना निवाला है।

जेब मे ना पैसे है, ना किसी का सहारा है।

परिवार की फिक्र में,वक़्त नहीं बिताना है।

बस चल पड़े है सफ़र पे, आगे क्या होगा किसने जाना है।

किससे करे शिकायत, सुनेगा कौन फरियाद अपनी।

दर्द ना जाने कोई, सबको पड़ी है अपनी अपनी।

बस खाली वादे सुन कर, सब्र का बांध टूट गया अपना।

पैदल ही निकल पड़े है,अब नहीं किसी के लिए है रुकना।

जिसको देखो,जहां देखो, बस ज्ञान हमें ही बांटें।

दर्द हमारा वो क्या जाने, पास है जिनके खाने को और घर है बिताने को रातें।

किसको जान नहीं प्यारी, जब अपनों पे बन आएं तो कोरी सारी बातें है।

ये सूरज अपना निकलता नहीं , अब दिन भी अपने काले है।

भीख कभी ना मांगी हमने, मेहनत मजदूरी करके खाया।

घर बनाया दूसरों का, अपना एक घर ना बना पाया।

मजदूर हम कहलाते है पर अब मजबूर हो गए।

हालात ना सुधरे तो कहीं ऐसा ना हो, ज़िन्दगी से ही महरूम हो गए।

© काव्या शेखर

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By kavyashekhr

अल्फाजों का गहरा समंदर हो और डूबकर कही नहीं जाना है बस डूबते जाना है , डूबते जाना है ।

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