“ज़िन्दगी का मेरी रोज का ये किस्सा है,
मेरे हर पल हर दिन का ये हिस्सा है
हर रोज तेरी तारीफ में कुछ नया लिखती हूं,
हर दिन शाम ढले खुद ही मिटा देती हूं
हर बार कुछ बदला सा होता है तुझमें
हर दफा तू लगे नया सा मुझे
अभी अधूरी है मेरी खोज
बाकी है अभी और करीब से पहचानना तुझे”
© काव्या शेखर