“कुछ नज़र आता नहीं, ज़िन्दगी में अंधेरे बहुत है ,ज़िन्दगी में मेरी, सूरज बनके आ जाना तुम ।
ना कोई बोलने वाला, ना कोई सुनने वाला, बस ख़ामोशी है,मेरी ज़िन्दगी में मेरी बकबक बनके आ जाना तुम ।
ना जाने क्यों, इन दिनों कड़वाहट सी बढ़ गई है, ज़िन्दगी में मेरी मिश्री बनकर घुल जाना तुम ।
अबकी जो आओ तो फिर लौट कर जाना ना कभी ,मेरी बाहों में ताउम्र के लिए ठहर जाना तुम”
©️ काव्या शेखर