सुन-सुन कर थक गया कि,
क़िस्मत से ही सब मिलता है,
तू व्यर्थ ही भाग रहा नामुमकिन मंज़िलों के पीछे । आख़िर मैंने भी दिल मे ठानी ,
नही चलने दूंगी क़िस्मत की मनमानी,
पूरा करके दिखाऊंगी ,जो दिल मे है ठानी।
रात-दिन दिन-रात करता रहूँगा कोशिशें,
देखना एक दिन क़िस्मत बनाने वाला ,
ख़ुद आकर कहेगा, जा ले जा अपनी क़िस्मत ।
©️ काव्या शेखर