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किस्मत

सुन-सुन कर थक गया कि,
क़िस्मत से ही सब मिलता है,
तू व्यर्थ ही भाग रहा नामुमकिन मंज़िलों के पीछे । आख़िर मैंने भी दिल मे ठानी ,
नही चलने दूंगी क़िस्मत की मनमानी,
पूरा करके दिखाऊंगी ,जो दिल मे है ठानी।
रात-दिन दिन-रात करता रहूँगा कोशिशें,
देखना एक दिन क़िस्मत बनाने वाला ,
ख़ुद आकर कहेगा, जा ले जा अपनी क़िस्मत ।

   
    ©️ काव्या शेखर
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By kavyashekhr

अल्फाजों का गहरा समंदर हो और डूबकर कही नहीं जाना है बस डूबते जाना है , डूबते जाना है ।

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