ये जाती पाती के फेर में तू क्यों बंदे पड़ता है,
उसने ही (ख़ुदा) जब फर्क किया ना तू क्यों पगले करता है ।
खोल समझ के पर्दे अपने देख चालें कोई चलता है,
हमको लड़वाता आपस मे अपना उल्लू सीधा करता है ।
आओ मिल कर खाए कसम ,ना जलने देंगे अपना वतन,
हम है भारत जो हर मंदिर ,हर मस्ज़िद में बसता है,
जो हर दिल मे रहता है ,ना है हिन्दू ना मुसलमान,
हम है बस हिन्दुस्तानी जो अपने वतन पे मरता है । 🇮🇳🇮🇳🇮🇳♥️
©️ काव्या शेखर
