Categories
Uncategorized

उड़ती फिरू

मन करता है पंछियों की तरह खुले आकाश में
उड़ती फिरु,
कोई कितना भी रोके किसी के रोके न रुकूँ ।
जो दिल मे आये करू वो मनमानी,
बचपन की तरह वो मीठी सी,प्यारी सी,
अल्हड़ सी शैतानी ।
कभी यहां कभी वहां,
उड़ती फिरू, उड़ती फिरू ,बस उड़ती फिरू।

©️ काव्या शेखर

kavyashekhr's avatar

By kavyashekhr

अल्फाजों का गहरा समंदर हो और डूबकर कही नहीं जाना है बस डूबते जाना है , डूबते जाना है ।

Design a site like this with WordPress.com
Get started