मन करता है पंछियों की तरह खुले आकाश में
उड़ती फिरु,
कोई कितना भी रोके किसी के रोके न रुकूँ ।
जो दिल मे आये करू वो मनमानी,
बचपन की तरह वो मीठी सी,प्यारी सी,
अल्हड़ सी शैतानी ।
कभी यहां कभी वहां,
उड़ती फिरू, उड़ती फिरू ,बस उड़ती फिरू।

©️ काव्या शेखर
मन करता है पंछियों की तरह खुले आकाश में
उड़ती फिरु,
कोई कितना भी रोके किसी के रोके न रुकूँ ।
जो दिल मे आये करू वो मनमानी,
बचपन की तरह वो मीठी सी,प्यारी सी,
अल्हड़ सी शैतानी ।
कभी यहां कभी वहां,
उड़ती फिरू, उड़ती फिरू ,बस उड़ती फिरू।

©️ काव्या शेखर