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हाथों की लकीरें

जहाँ जहाँ से गुज़रे, हर एक से पुछा तुम्हें,
जब भी कुछ मांगा ख़ुदा से, बस मांगा तुम्हें ।
ये जानती हूँ की शायद, तुम मेरी किस्मत में नही, फिर भी इन हाथोँ की लकीरों में ढूंढा तुम्हें। अंजाम चाहें जो भी हो, मैंने तो इस दिल को बिछाया तेरी इन राहों में,
खवाइश है बस इतनी सी, बस ये ज़िन्दगी गुज़रे तेरी पनाहों में ।
तेरे प्यार की ख़ूशुबू बिखरी इन हवाओं में । हसरत हैं बस इतनी सी इस पागल दिल की,
की मौत भी आये तो तेरी बाहों में ।

©️ काव्या शेखर

Photo by Hassan OUAJBIR on Pexels.com
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By kavyashekhr

अल्फाजों का गहरा समंदर हो और डूबकर कही नहीं जाना है बस डूबते जाना है , डूबते जाना है ।

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